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बात इतनी सी उनको सताने लगी

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स्वाद जस का ले तुम क्या चखोगे कहो आज अपनी कमर क्या कसोगे कहो मैं बुलंदी पे लेकर चलूँगी तुम्हें एक इतिहास फिर क्या रचोगे कहो। बात इतनी सी उनको सताने लगी मैं क्यों लोगों की नजरों में आने लगी रात दिन जब मैं छूने लगी आसमाँ आग हर पल उन्हें तब जलाने लगी मुहब्बत हो या रुसवाई, सभी रँग घोलतीं आँखें। छुपा लो लाख हाल-ए-दिल, अजी सब बोलतीं आँखें।। बड़ी चंचल सयानी हैं बना लेतीं हैं दीवाना। नज़ारों को नज़र में भर, नशे में डोलतीं आँखें।।