स्वर्णिम भारत के निर्माण में योगदान (81)
मैं बाबा की वो मीठी बच्ची हूं... वो कली हूं.... जो कभी मुरझाती नहीं...! सिर्फ बाबा के अलावा.... कहीं और सर झुकाती नहीं...! भिड़ जाती हूं... दुनिया के खरपतवारों से....! बेवजह.... किसी को सर पर बिठाती नहीं...!! जिसे कोई न पढ़ पाया, मैं ऐसी इक कहानी हूं। मुहब्बत है, मुझे खुद से, मैं खुद की ही दिवानी हूं।। खुदा है इश्क़ 'माही' का , चढ़ा सिर पर करे नर्तन। गढा़ है जिसको बाबा ने, गजल मैं वो रूहानी हूं।। पांच तत्व से है बना, मेरा सुंदर रूप । मैं तो हूं एक आत्मा, बिंदी ज्योति स्वरूप।। नाम मेरा है शिव पिया , दिया प्रभु ने आन। कुछ प्रतिभा माही कहे, कुछ अब तक अनजान।। स्वर्णिम भारत के निर्माण में , मैं अपनी आहुति देते हुए मैं कहना चाहती हूं बज़्म में आए हो प्यार कर लो ज़रा। थाम कर हाथ में हाथ नच लो ज़रा।। कल इजाजत समय की मिले ना मिले। ठोक कर तालिया आज हँस लो ज़रा ।। परिवर्तन की आई बेला बच्चों पास बुला लो तुम आया हूं मैं आज धरा पर थोड़ा समय निकालो तुम आज समय है संगम युग का , सतयुग में ले जाएगा....