रत्नाकर से वाल्मीकि : आत्मपरिवर्तन और जीवन-परिवर्तन की प्रेरणाज-[लेख] डॉ प्रतिभा माही
वाल्मीकि रामायण पर विशेष लेख : डॉ. प्रतिभा 'माही' द्वारा हम सबके भीतर बैठा है एक रत्नाकर, रत्नाकर कोई जन्मजात दस्यु अर्थात डाकू, चोर, लुटेरा, या अत्याचारी नहीं था। वह एक गृहस्थ था, जो अपने परिवार का पेट पालने के लिए वन में राहगीरों को लूटता था। उसे लगता था कि वह धर्म का कार्य कर रहा है —अर्थात परिवार-धर्म निभा रहा है। रत्नाकर का आत्म परिवर्तन कैसे हुआ: हमारे मन में एक प्रश्न उठता है कि आज हम सब में से कौन रत्नाकर नहीं है? कोई पद-प्रतिष्ठा लूट रहा है, कोई दूसरों का समय लूट रहा है, कोई रिश्तों में अपना स्वार्थ लूट रहा है और हम भी यही तर्क देते हैं —कि "हम ये सब परिवार के और बच्चों के लिए करते हैं।" पर सप्तऋषियों ने रत्नाकर से एक सीधा प्रश्न पूछा — "जिस परिवार के लिए तू पाप कर रहा है, क्या वह तेरे पाप का भागीदार बनेगा?" रत्नाकर ने...