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बात इतनी सी उनको सताने लगी

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स्वाद जस का ले तुम क्या चखोगे कहो आज अपनी कमर क्या कसोगे कहो मैं बुलंदी पे लेकर चलूँगी तुम्हें एक इतिहास फिर क्या रचोगे कहो। बात इतनी सी उनको सताने लगी मैं क्यों लोगों की नजरों में आने लगी रात दिन जब मैं छूने लगी आसमाँ आग हर पल उन्हें तब जलाने लगी मुहब्बत हो या रुसवाई, सभी रँग घोलतीं आँखें। छुपा लो लाख हाल-ए-दिल, अजी सब बोलतीं आँखें।। बड़ी चंचल सयानी हैं बना लेतीं हैं दीवाना। नज़ारों को नज़र में भर, नशे में डोलतीं आँखें।।

राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन व सम्मान समारोह: 21वां वार्षिक महोत्सव 2025

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राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन व सम्मान समारोह:               21वां वार्षिक महोत्सव 2025             एम•के• साहित्य अकादमी, पंचकूला द्वारा हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के सहयोग से 21वां वार्षिक समारोह 30 नवंबर 2025, रविवार को आयोजित किया। इस अवसर पर राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन के साथ भव्य अवार्ड एवं सम्मान समारोह का आयोजन वरिष्ठ नागरिक परिषद, सेक्टर-15, पंचकूला के सभागार में किया गया। यह समारोह स्वर्गीय डॉ. मनोज गुप्ता की स्मृति में प्रतिवर्ष नवंबर माह में आयोजित किया जाता है।            इस समारोह  में मुख्य अतिथि: डॉ. रंजीत सिंह जादौन (I/C  PAMC पंचकूला एवं उपनिदेशक AH & D, पंचकूला) रहे, उन्होंने सम्पूर्ण समारोह की सराहना की तथा श्री रविंदर शर्मा, श्री करतार सिंह एलावादी ,श्रीमती प्रेम सोमरा जी एवं श्री पवन गुप्ता ने विशेष अतिथि की भूमिका निभाई। सम्पूर्ण समारोह डॉ. राजेन्द्र कुमार 'कनोजिया' (चंडीगढ़) जोकि एक प्रख्यात साहित्यकार एवं कवि हैं तथा PGI आर्थो विशेषज्ञ भी हैं, की अ...
जब रूह लगी , थी छटपटाने , तब पड़ी ख़त पर नजर। जो खत कभी, उसने लिखा था , चीर कर अपना जिगर।   याद आतीं हैं बहुत ही प्यार की वो चिठ्ठियाँ। लाएगा कब डाकिया अब प्यार की वो चिठ्ठियाँ। डाकिया आता नज़र जब पास जाते दौड़ कर। हाथ में ले खोजते हैं, प्यार की वो चिठ्ठियाँ।

मैं हूँ तेरी हीर

  तरस रही मैं तो सदियों से, समझ ले मेरी पीर। तपूँ आग में सुन ले राँझा, ब न जा मेरा नीर।। रोम-रोम मेरे इस तन का, गाता तेर ा नाम। रेगिस्तानी तपे रेत सी, मैं हूँ तेरी हीर ।   धड़कनों ने कहा, तुम वही हो वही मेरी रूह ने तुम्हें यार अपना लिया दिल चहकने लगा, तुम वही हो वही तुम वही हो वही, तुम वही हो वही तुम वही हो वही,तुम वही हो वही   मैं चली आई दौड़ी तेरे संग प्रिये भूलकर इस जहां की ये सारी खुशी क्या कहूँ मैं तुम्हें और क्या ना कहूँ सर झुका, कर समर्पण, आ सजदा किया मेरी रूह ने तुम्हें यार अपना लिया दिल चहकने लगा, तुम वही हो वही तुम वही हो वही, तुम वही हो वही तुम वही हो वही,तुम वही हो वही   होश खुद का नहीं बस तुही तू दिखे और भाये न कुछ नाम रटती रहूँ हो गई मैं विदेह जब मैं तुमसे मिली प्रेम उमडा़ जिया मैं तो बरसा दिया मेरी रूह ने तुम्हें यार अपना लिया दिल चहकने लगा, तुम वही हो वही तुम वही हो वही, तुम वही हो वही तुम वही हो वही,तुम वही हो वही   कितनी सदियों में हम तुम मिले हैं यहाँ जन्म जन्मों से ...

माटी में मिल जाएगा

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बीत गया जो वक्त कभी वो , लौट न वापस आएगा ...! माटी का पुतला है तू , माटी में मिल जाएगा .....! माटी में   मिल जाएगा .....!   आजा मिलकर जतन करें और लोगों का उपकार करें ...! प्यार बाँट कर इस दुनिया को , प्यार भरा भंडार भरें ...! प्यार भरा भंडार भरे ...!2 जो कुछ   बाँटा इस धरती पर , जन्नत में तू पाएगा ...! माटी का पुतला है तू , माटी में   मिल जाएगा ....! माटी में   मिल जाएगा ....! बीत गया जो वक्त कभी वो , लौट न वापस आएगा ...!   आओ प्यारे पास हमारे , सच्ची बात बताते हैं ...! निर्धन निर्बल भूखे प्यासे , सबको कण्ठ लगाते हैं ...! सबको कण्ठ लगाते हैं ...! हुनर सिखाते हैं जीने का , किस्सा जन - जन गाएगा ...! माटी का पुतला है तू , माटी में   मिल जाएगा ....! माटी में मिल जाएगा ....! बीत गया जो वक्त कभी वो , लौट न वापस आएगा ...!     अपने कर्मों की खेती से, दिल मे ं जगह बनाले तू..! सुन ले यारा ...

जां निकलने से से पहले चले आओ तुम

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भीड़ में भी रहे हम अकेले   बहुत ...!! रंग कुदरत के हमने भी देखे बहुत ...! डूब कर इश्क़ में हमने पाया जिसे ..! उसके दुनिया में लगते हैं मेले बहुत ...!!     जब जनाज़ा मेरा वो उठाने लगे। तार धड़कन के यूं गुनगुनाने लगे।। थोड़ा ठहरो अभी उनको आने तो दो। वो तो माही को अपने बुलाने लगे।।     * ग़ज़ल *   जां   निकलने से से पहले   चले आओ तुम।। जिस्म जलने से पहले   चले आओ तुम।।   वक्त कटता नही डसती तन्हाई है। मन मचलने से पहले   चले आओ तुम।।   अश्क़ झरते   नहीं देह पथरा गई। तन बदलने से पहले   चले आओ तुम।।   मर न जाएं कहीं आरज़ू ले तेरी। रूह के चलने से पहले   चले आओ तुम।।   माना मजबूर हो , ' माही ' तुम दूर   हो। वक़्त ढलने से पहले   चले आओ तुम।।   © Dr Pratibha 'Mahi' Panchkula {10/4/2024}

बोलो क्या सुनना चाहते हो तुम...? जो तुम कहदो वही सुनाऊं...!!! 21/03/2025

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प्रेम सु नाऊं , हास्य सु नाऊं ,                     वीरों की ललकार सुनाऊँ ..! दिल  में  प लता प्यार सु नाऊं ,                    या सजता श्रृंगार  सुनाऊँ ...!! कुदरत का हर रंग है यारो ,                       हर र स की मधुशाला है..! भारत  माँ के वाशिंदों की,                     यार कहो चीत्कार  सुनाऊँ ...!! जो तुम कहदो वही   सुनाऊँ ...!!! जो तुम कहदो वही   सुनाऊँ ...!!! रूह से रूह का मिलन करा कर ...! रूहानी मंज़र  दिखलाऊँ   ...! जो तुम कहदो वही   सुनाऊँ ...!! गीत-ग़ज़ल मुक्तक सब कु छ है...! कौन - कौन से रँग दिखलाऊँ ..! जो तुम कहदो वही  सुनाऊँ ....!! मेरी र ब की पक्की यारी ..! मिलना हो तो मैं मिलवा ऊँ ...! जो तुम कहदो वही   सुनाऊँ ...!!   मैं गीत हूँ संगीत हूँ हर द...