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देश भक्ति मुक्तक

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कलम के सिपाही उठो वीर सैनिक क़दम तुम बढ़ाओ। नये रूप में तुम नया युग सजाओ।। बना योजना तुम पलट दो ये पासा । कलम के सिपाही हुनर कुछ दिखाओ।। रो रही माँ भारती क्या बताएं क्या घटे इन पत्थरों के शहर में रो रही माँ भारती अब पत्थरों के शहर में मर गयी इन्सानित औ ज़ुर्म मुहुँ फाड़े खड़ा हो गया इंसान भी पत्थर पत्थरों के शहर में भारत' नाम बता आना उठो देश के वीर सपूतो, अपना कदम बढ़ाओ तुम भारत की रक्षा की ख़ातिर, दुश्मन से टकराओ तुम दुश्मन की करतूतों का, अच्छा सबक सिखा आना कोई नाम तुम्हारा पूछे, भारत' नाम बता आना जायें छोड़कर भारत को जो चाटें तलवे दुश्मन के, वो जायें छोड़कर भारत को। जो छेद करें खा थाली में, वो जायें छोड़कर भारत को।। बात करें क्या ग़द्दारों की, जो रोज तिजोरी भरते हैं। जो बिन पेंदी के हैं लोटे, वो जायें छोड़कर भारत को।। देश निकाला दो उनको जो भिड़वा देते आपस मे, तुम देश निकाला दो उनको। जो करें दोगली बात सदा, तुम देश निकाला दो उनको।। कर दो उनको बेपर्दा अब, जो भेष बदल कर रहते हैं। जो नौंच-नौंच खाते भारत, तुम देश निकाला दो उनको।। दीवानों की टोलियाँ आज़ादी को चली बचाने दीवानों की...

एक सैनिक की दो माशुका

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                    एक सैनिक की दो माशुका              एक सैनिक, जिसकी शादी होने वाली होती है अपनी प्यारी माशुका , जिसे वो बहुत प्यार करता है , किन्तु युद्ध छिड़ने के कारण, सभी सैनिकों के लिए, सरहद से बुलावा आ जाता है कि तुम्हें अपनी ड्यूटी पर अभी इसी वक्त निकलना है और वह अपनी ड्यूटी पर चला जाता है । किंतु उसकी शादी नहीं हो पाती , माशुका इंतजार करने का वादा करती है और सैनिक जल्दी आने की कह कर चला जाता है।              दिन - महीने - साल गुज़र जाते हैं, किन्तु वह एक दूसरे से नहीं मिल पाते। तब सैनिक एक पत्र के माध्यम से अपना संदेशा अपनी माशुका को भेजता है क्या कहता है देखिए: सुनो मैं आज निकलूंगा,फलक पर चांद बनकर के...! रहेगी याद मेरे संग,तेरी बारात बनकर के...! अगर फुर्सत मिले तुमको,चली आना. सुनो छत पर..! झरूंगा चांदनी सा मैं, तेरे जज्बात बनकर के..!        वीर सैनिक की माशुका...

प्यार व रिश्ते

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क्षणिकाएं   श र्त रिश्ता दोस्ती का हो. ... या प्यार का . ..! रिश्ते में कभी . ... किसी भी तरह की. ... कोई भी शर्त .... नहीं होनी चाहिए . ..!!   झूठ की नींव जब भी किसी. ... नए रिश्ते की शुरुआत करें. ...! सच के साथ रिश्ता स्वीकार करें . .....! झूठ की नींव पर. .... महल खड़े नहीं किए जाते . ....!!   सच्चे साथी अपने हों या पराये. ... दोस्त हों या रिश्तेदार. ... जो संकट में आपका   साथ दें. ...! या आपके काम आयें . ... वही आपके सच्चे साथी हैं. .... ¡   प्यार कोई पौधा हो... या कोई रिश्ता बाबू....! प्यार से सींचने पर..... उसमें जान आ ही जाती है.....! !    बेपनाह ये ज़रूरी तो नहीं..... कि जिसे तुम .... बेपनाह प्यार करते हो... ! वो भी तुम्हें उतना ही प्यार क रेगा ....! !   नया दौर न ए य ुग क ा..... बदल ता ह ुआ न या द ौर ह ै साहिब...! बदलाव के साथ ... बदलना ही लाज़मी है....! ! !   ...

बात इतनी सी उनको सताने लगी

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स्वाद जस का ले तुम क्या चखोगे कहो आज अपनी कमर क्या कसोगे कहो मैं बुलंदी पे लेकर चलूँगी तुम्हें एक इतिहास फिर क्या रचोगे कहो। बात इतनी सी उनको सताने लगी मैं क्यों लोगों की नजरों में आने लगी रात दिन जब मैं छूने लगी आसमाँ आग हर पल उन्हें तब जलाने लगी मुहब्बत हो या रुसवाई, सभी रँग घोलतीं आँखें। छुपा लो लाख हाल-ए-दिल, अजी सब बोलतीं आँखें।। बड़ी चंचल सयानी हैं बना लेतीं हैं दीवाना। नज़ारों को नज़र में भर, नशे में डोलतीं आँखें।।

राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन व सम्मान समारोह: 21वां वार्षिक महोत्सव 2025

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राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन व सम्मान समारोह:               21वां वार्षिक महोत्सव 2025             एम•के• साहित्य अकादमी, पंचकूला द्वारा हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के सहयोग से 21वां वार्षिक समारोह 30 नवंबर 2025, रविवार को आयोजित किया। इस अवसर पर राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन के साथ भव्य अवार्ड एवं सम्मान समारोह का आयोजन वरिष्ठ नागरिक परिषद, सेक्टर-15, पंचकूला के सभागार में किया गया। यह समारोह स्वर्गीय डॉ. मनोज गुप्ता की स्मृति में प्रतिवर्ष नवंबर माह में आयोजित किया जाता है।            इस समारोह  में मुख्य अतिथि: डॉ. रंजीत सिंह जादौन (I/C  PAMC पंचकूला एवं उपनिदेशक AH & D, पंचकूला) रहे, उन्होंने सम्पूर्ण समारोह की सराहना की तथा श्री रविंदर शर्मा, श्री करतार सिंह एलावादी ,श्रीमती प्रेम सोमरा जी एवं श्री पवन गुप्ता ने विशेष अतिथि की भूमिका निभाई। सम्पूर्ण समारोह डॉ. राजेन्द्र कुमार 'कनोजिया' (चंडीगढ़) जोकि एक प्रख्यात साहित्यकार एवं कवि हैं तथा PGI आर्थो विशेषज्ञ भी हैं, की अ...
जब रूह लगी , थी छटपटाने , तब पड़ी ख़त पर नजर। जो खत कभी, उसने लिखा था , चीर कर अपना जिगर।   याद आतीं हैं बहुत ही प्यार की वो चिठ्ठियाँ। लाएगा कब डाकिया अब प्यार की वो चिठ्ठियाँ। डाकिया आता नज़र जब पास जाते दौड़ कर। हाथ में ले खोजते हैं, प्यार की वो चिठ्ठियाँ।

मैं हूँ तेरी हीर

  तरस रही मैं तो सदियों से, समझ ले मेरी पीर। तपूँ आग में सुन ले राँझा, ब न जा मेरा नीर।। रोम-रोम मेरे इस तन का, गाता तेर ा नाम। रेगिस्तानी तपे रेत सी, मैं हूँ तेरी हीर ।   धड़कनों ने कहा, तुम वही हो वही मेरी रूह ने तुम्हें यार अपना लिया दिल चहकने लगा, तुम वही हो वही तुम वही हो वही, तुम वही हो वही तुम वही हो वही,तुम वही हो वही   मैं चली आई दौड़ी तेरे संग प्रिये भूलकर इस जहां की ये सारी खुशी क्या कहूँ मैं तुम्हें और क्या ना कहूँ सर झुका, कर समर्पण, आ सजदा किया मेरी रूह ने तुम्हें यार अपना लिया दिल चहकने लगा, तुम वही हो वही तुम वही हो वही, तुम वही हो वही तुम वही हो वही,तुम वही हो वही   होश खुद का नहीं बस तुही तू दिखे और भाये न कुछ नाम रटती रहूँ हो गई मैं विदेह जब मैं तुमसे मिली प्रेम उमडा़ जिया मैं तो बरसा दिया मेरी रूह ने तुम्हें यार अपना लिया दिल चहकने लगा, तुम वही हो वही तुम वही हो वही, तुम वही हो वही तुम वही हो वही,तुम वही हो वही   कितनी सदियों में हम तुम मिले हैं यहाँ जन्म जन्मों से ...