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दियों को जलाकर, अँधेरा मिटाना 【41】

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ग़ज़ल दियों को जलाकर, अँधेरा मिटाना तू चुन चुन के खुशियाँ, चमन ये सजाना बरसती रहे मेहर, रब की सदा ही दिलों में मुहब्बत, की शम्मा जलाना गरीबों की कुटिया, रहे अब न सूनी तु लक्ष्मी से उनका, भी परिचय कराना डगर में कोई जब, मिले तुझको भूखा तु भोजन कराकर, सुधारस पिलाना दुआओं से भरता, रहे तेरा दामन हँसीं उन पलों को, तू हर-पल चुराना ये पितु मात ही तो, ख़ुदा की मूरत हैं सँजोकर हिया में, मुहब्बत लुटाना तू 'माही' का पुत्तर,बना आज 'माही' तू जीने का सबको, हुनर अब सिखाना ©डॉ० प्रतिभा 'माही''

हुई हूँ मैं तेरी जब से ....【36】

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ग़ज़ल वो जिस भी रूप में आये, मुझे स्वीकार है अब तो करूँ इनकार कैसे मैं , मेरा दिलदार है अब तो उसी ने है गढ़ा मुझको, उसी ने आ सँवारा है हवाले कर दिया खुदको, वही सरकार है अब तो जिगर की खोलकर परतें, रमाई है वहाँ धूनी छुपा बैठा है अन्तर में, मेरा हक़दार है अब तो बरसता बन कभी बादल, कभी भँवरे सा मंडराता करुँ श्रृंगार क्यूँ नकली, वही श्रृंगार है अब तो जिधर जाती नज़र मेरी, उधर उसको ही पाती है हुई हूँ मैं तेरी जब से , चमन गुलज़ार है अब तो © डॉ० प्रतिभा 'माही'