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bhor ka shringar kar [47]

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हवन कर करो शुद्ध वातावरण को 【46】

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मुक्तक 【45】

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न जाने ये कैसी बेक़रारी है 【44】

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नई ग़ज़ल: दीवानी (43)

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बीत गया जो वक्त तुम्हारा, लौट न वापस आएगा 【42】

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  इस धरा का इस धरा पर सब धरा रह जाएगा  आओ उसको याद करें जो, पार हमें ले जाएगा बीत गया जो वक्त तुम्हारा, लौट न वापस आएगा इस धरा का इस धरा पर....।। भूल कर बैठा है उसको, जिसका प्यारे अंश तू  उससे ही अस्तित्व तेरा , है उसी का वंश तू  थाम ले उंगली उसी की, ढाल वह बन जाएगा  अब तो उसको याद कर ले वरना फिर पछताएगा  इस धरा का इस धरा पर ....।। स्वप्न सा संसार है यह , कुछ पलों का आसरा  हैं मुसाफ़िर हम यहाँ पर है अज़ब ही माज़रा  खूबसूरत हर नजारा एक दिवस ढह जाएगा  अब तो उसको याद कर ले वरना फिर पछताएगा  इस धरा का इस तरह ......।। © डॉ० प्रतिभा 'माही'

दियों को जलाकर, अँधेरा मिटाना 【41】

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ग़ज़ल दियों को जलाकर, अँधेरा मिटाना तू चुन चुन के खुशियाँ, चमन ये सजाना बरसती रहे मेहर, रब की सदा ही दिलों में मुहब्बत, की शम्मा जलाना गरीबों की कुटिया, रहे अब न सूनी तु लक्ष्मी से उनका, भी परिचय कराना डगर में कोई जब, मिले तुझको भूखा तु भोजन कराकर, सुधारस पिलाना दुआओं से भरता, रहे तेरा दामन हँसीं उन पलों को, तू हर-पल चुराना ये पितु मात ही तो, ख़ुदा की मूरत हैं सँजोकर हिया में, मुहब्बत लुटाना तू 'माही' का पुत्तर,बना आज 'माही' तू जीने का सबको, हुनर अब सिखाना ©डॉ० प्रतिभा 'माही''