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नज़र लग जाये ना【60】

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इश्क़-ए माही 【59】

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इश्क़-ए-माही  पुस्तक खरीदने व पढ़ने के लिए आप amazon पर नीचे दिए लिंक के माध्यम से जा सकते हैं। https://www.facebook.com/pratibhagupta.mahi/videos/592376635232491/?fs=e&s=cl ★'इश्क़-ए-माही '(ग़ज़ल संग्रह) साहित्यकार © डॉ० प्रतिभा 'माही'' https://www.amazon.in/dp/B08B69XP2W/ref=cm_sw_r_cp_apa_glt_fabc_Q47YHC2JKQM4YR2YX5JX

इबारत...ISHQ HUN....【58】

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                                  इबारत                                 इश्क़ हूँ .....                               इबादत हूँ .....                              मोहब्ब्त हूँ .....                   रहमत हूँ ख़ुदा की, क़यामत हूँ ....!                              दिल्लगी हूँ ....                              आरज़ू हूँ .....                             नज़ाकत हूँ ......            ...

ना तेरा है ना मेरा है...【57】

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माँ का कर्ज़ 【55】

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    वक़्त     मुलाकात     बन्दिशें     चकोरी     ग़म का समन्दर       माँ का कर्ज़

समीक्षा: पुस्तक 'इश्क़ इबादत' की डॉ० मनोज भारत द्वारा 【54】

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समीक्षा:     डॉ मनोज भारत (कवि एवं समालोचक) द्वारा। पुस्तक:      'इश्क़ इबादत' (काव्य संग्रह )। रचनाकार:   डॉ० प्रतिभा 'माही' पंचकूला।             डॉ० प्रतिभा माही एक सार्थक और सक्रिय सृजनधर्मी हैं। विभिन्न साहित्यिक विधाओं में उनके कई संकलन प्रकाशित हो चुके हैं तथा कई संकलन प्रकाशनाधीन हैं। उनका पहला ग़ज़ल संग्रह ' इश्क़ मेरा सूफ़ियाना'  साहित्य जगत की सुर्ख़ियों में रह चुका है। उनकी ग़ज़लों का जादू पाठकों के सर चढ़ कर बोला है। जब वे ' चंदामामा आओ ना' जैसा बाल साहित्य लिखती हैं, तो बच्चों की मनोदैहिक समस्त आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए बाल-मनोविज्ञान की समस्त धारणाओं की अनुपालना करती हैं। जब वे सूफ़ियाना रूहानियत में विचरण करते हुए 'इश्क़ मेरा सूफ़ियाना ' लिखती हैं तो उनका अंदाज़ एक गूढ़ दार्शनिक जैसा हो जाता है।                      डॉ० प्रतिभा 'माही' प्रकाशन के साथ-साथ मंचीय आयोजनों में भी सक्रिय सहभागिता करती रही हैं। वे  एक सफल कवयित्री, ग़ज़लगो, स...

जब से खुदको पढ़ना सीखा 【53】

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ग़ज़ल जब से खुदको पढ़ना सीखा । बस खुद मैं ही ढलना सीखा।। रुह से रुह का कैसा पर्दा । रुह ने रुह में बसना सीखा।। क्या खुशियाँ क्या ग़म का मंज़र। हर लम्हें में हँसना सीखा।। अपनों की ख़ातिर बस पल पल। शम्मा सा बस जलना सीखा।। सात स्वरूपों को संग लेकर। अक्स तेरा बन चलना सीखा ।। © #Dr.Pratibha_Mahi