【02】झोली में मेरी क्या है...? दो रूहों की बात




एक दिन...
मेरी सहेली की रूह......!
मेरे ख्वाब में आई....
और फूट फूट कर रोने लगी... 
लिपट गयी मेरी रूह से आकर ....
बोली....!

बहन ...!
झोली में मेरी क्या है...?
कुछ भी तो नही...
जन्म होते ही पिता चल बसे...
कुछ वर्ष बाद माँ भी चली गयी...!
मामा मामी ने आकर ...
घर पर भी कब्ज़ा कर लिया...
स्कूल जाना भी बन्द हो गया....
नोकरानी की तरह... 
दिन रात काम करना....
मार खाना....
जली कटी सुनना...
यही सब है मेरी झोली में....!

फिर बोली....
बहन तू बता ....
तू कैसी है ...?
तेरी झोली में क्या है...?

मेरी रूह बोली...
बहन दुखी तो मैं भी थी....
मेरे माता पिता ने तो...
मुझे बोझ समझ कर ...
मरने के लिए ...
भरी वारिश में ...
मन्दिर की सीढ़ी पर छोड़ दिया...!
मैं बीमार थी...
वो छोटे भाई को लेकर चले गए....!

पूजा दीदी जो हमेशा...
सफेद साड़ी पहनती हैं....
मुझे अपने साथ ले आयीं...
मैं उन्हीं के साथ ....
रहती हूँ....!

आज मेरी झोली में ....
सुख का सागर....
खुशियों का भंडार है....
बाबा के प्रेम की....
अपार बौछार है....
खुला आसमां सुनहरा जहाँ है.....
स्वर्ग सा घर है ....
जिसे सब जन्नत कहते हैं....
मेरी बहन हम वहीं रहते हैं.....!

तुम भी आ जाओ ....
ख़ुशी के चमन में....
झोली भर लो बाबा के प्यार से ....
और ....
ज्ञान के समुन्दर में...
डुबकी लगाकार....
खो जाओ बाबा की याद में....
जो आनन्द के सागर हैं....!

भर जाएगी... 
तेरी भी झोली....
आजा बहन...
आजा मेरे पास....
मिल कर रहेंगे इस चमन में....!
और फिर... 
साथ चलेंगे अपने वतन में....!
© डॉ० प्रतिभा 'माही' शिवपिया
26/05/2020

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