एक सैनिक की दो माशुका


                   एक सैनिक की दो माशुका 


            एक सैनिक, जिसकी शादी होने वाली होती है अपनी प्यारी माशुका , जिसे वो बहुत प्यार करता है , किन्तु युद्ध छिड़ने के कारण, सभी सैनिकों के लिए, सरहद से बुलावा आ जाता है कि तुम्हें अपनी ड्यूटी पर अभी इसी वक्त निकलना है और वह अपनी ड्यूटी पर चला जाता है । किंतु उसकी शादी नहीं हो पाती , माशुका इंतजार करने का वादा करती है और सैनिक जल्दी आने की कह कर चला जाता है। 




            दिन - महीने - साल गुज़र जाते हैं, किन्तु वह एक दूसरे से नहीं मिल पाते। तब सैनिक एक पत्र के माध्यम से अपना संदेशा अपनी माशुका को भेजता है क्या कहता है देखिए:




सुनो मैं आज निकलूंगा,फलक पर चांद बनकर के...!
रहेगी याद मेरे संग,तेरी बारात बनकर के...!
अगर फुर्सत मिले तुमको,चली आना. सुनो छत पर..!
झरूंगा चांदनी सा मैं, तेरे जज्बात बनकर के..!




       वीर सैनिक की माशुका बड़ी भोली है, एक गांव में रहती है, वह अपने माशूक को चंद पंक्तियों के माध्यम से क्या उत्तर देती है देखें...!



सितारे सब मुझे तक कर, हँसी मेरी उड़ाएंगे...!
करेंगे गुफ्तगू मिलकर, सुनो मुझको चिढ़ाएंगे...!
अगर बारात लानी है, खयालों में चले आना..!
वहीं मिलकर सुनो हम तुम, विवाह अपना रचाएंगे...!


         जब तकउ सकी माशुका को यह पत्र मिलता है तब तक सैनिक अपनी दूसरी मशुका अपनी धरती मां के लिए शहीद हो जाता है। और सदा के लिए अपनी पहली माशुका के ख्यालों में बस जाता है। जिसका अंत एक साल के रूप में करना चाहूंगी:




पहली दुल्हन है देहात की, है दूजी वतन की सरहद।
इश्क़ हुआ उसको दोनों से , दोनों हीं दिल की हसरत।
अश्वासन देकर प्रीत को, वो आन मिला वसुधा से।
भारत की रक्षा की ख़ातिर,जा तोड़ दी उसने हरहद।।



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                                                           © Dr Pratibha 'Mahi' 


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