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ना तेरा है ना मेरा है...【57】

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माँ का कर्ज़ 【55】

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    वक़्त     मुलाकात     बन्दिशें     चकोरी     ग़म का समन्दर       माँ का कर्ज़

समीक्षा: पुस्तक 'इश्क़ इबादत' की डॉ० मनोज भारत द्वारा 【54】

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समीक्षा:     डॉ मनोज भारत (कवि एवं समालोचक) द्वारा। पुस्तक:      'इश्क़ इबादत' (काव्य संग्रह )। रचनाकार:   डॉ० प्रतिभा 'माही' पंचकूला।             डॉ० प्रतिभा माही एक सार्थक और सक्रिय सृजनधर्मी हैं। विभिन्न साहित्यिक विधाओं में उनके कई संकलन प्रकाशित हो चुके हैं तथा कई संकलन प्रकाशनाधीन हैं। उनका पहला ग़ज़ल संग्रह ' इश्क़ मेरा सूफ़ियाना'  साहित्य जगत की सुर्ख़ियों में रह चुका है। उनकी ग़ज़लों का जादू पाठकों के सर चढ़ कर बोला है। जब वे ' चंदामामा आओ ना' जैसा बाल साहित्य लिखती हैं, तो बच्चों की मनोदैहिक समस्त आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए बाल-मनोविज्ञान की समस्त धारणाओं की अनुपालना करती हैं। जब वे सूफ़ियाना रूहानियत में विचरण करते हुए 'इश्क़ मेरा सूफ़ियाना ' लिखती हैं तो उनका अंदाज़ एक गूढ़ दार्शनिक जैसा हो जाता है।                      डॉ० प्रतिभा 'माही' प्रकाशन के साथ-साथ मंचीय आयोजनों में भी सक्रिय सहभागिता करती रही हैं। वे  एक सफल कवयित्री, ग़ज़लगो, स...

जब से खुदको पढ़ना सीखा 【53】

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ग़ज़ल जब से खुदको पढ़ना सीखा । बस खुद मैं ही ढलना सीखा।। रुह से रुह का कैसा पर्दा । रुह ने रुह में बसना सीखा।। क्या खुशियाँ क्या ग़म का मंज़र। हर लम्हें में हँसना सीखा।। अपनों की ख़ातिर बस पल पल। शम्मा सा बस जलना सीखा।। सात स्वरूपों को संग लेकर। अक्स तेरा बन चलना सीखा ।। © #Dr.Pratibha_Mahi

अस्तित्व- नज़र- पहलू- हमसाया- अजनबी【56】

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कुछ सूफ़ी कषेणिकाएं *पहलू*  जी चाहता है.... तेरे पहलू में ख़ुद को... छुपा लूँ.....! और...  फ़ना हो जाऊँ सदा के लिए..!  *नज़र* आ उढ़ादे .... अपनी रहमत की चादर....! लगादे काला टीका..! ताकि... नज़र ना लगे ज़माने की....!  *हमसाया*  आ कह दे... इस आदमखोर ज़माने से....! अकेली नहीं है 'माही'....! मेरा हमसाया.... सदा रहता है उसके साथ....!  *अजनबी*  तू और मैं.... अब अजनबी कहाँ..... मैं दूध तो तू पानी है...! अगर मिल जायें .... तो अलग करना मुमकिन नही....!  *अस्तित्व*  मैं तू... और तू मैं है... तू नहीं तो मैं नहीं...!! और.... मैं नहीं... तो तेरा कोई अस्तित्व नही....! ©डॉ०प्रतिभा माही(10/08/2018)

दिल तो बच्चा है【52】

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क्या आप सभी को अपना बचपन याद आता है...? दोस्तों ..!           क्या आप सभी को अपना बचपन याद आता है, ज़रूर आता होगा,  क्योंकि मुझे भी अपना बचपन बहुत याद आता है । मेरा दिल करता है  कि मैं उन्हीं दिनों में वापस लौट जाऊँ , पर ऐसा मुमकिन नहीं है ।              आपका दिल भी करता होगा कि आप  भी उन्हीं बचपन के दिनों में वापस लौट जायें , पर ऐसा नहीं हो सकता , हम बस उन दिनों को याद कर सकते हैं । उन्हीं दिन की यादों को सँजोते हुए , मैंने कुछ पंक्तियां कविता व ग़ज़ल के रूप में प्रस्तुत की है .....! मनचले   ******* आ चल ....! ले चलूँ तुझे... बचपन के उस दौर में ...! जब हम ... कुछ नटखट... कुछ भोले और मासूम... कुछ तेज तर्रार... तितली और भँवरे से उड़ा करते..! लड़ते झगड़ते.. रूठ जाते.. एक दूसरे से... बात बात पर कट्टी करते.... और... अगले ही पल पुच्चा कर लेते..! बन्दरों की भाँति... उछलते कूदते.... एक दूसरे की नकल कर... आपस मे चिढ़ाते... नाचते गाते... गले लगा लेते... न किसी का भय.... न किसी की फिकर.... हम सब ऐसे ही... मनचले थे ......

"कवियों का दिल अदब की महफ़िल" (खुशियों के पल) 【01】अखिल भारतीय कविसम्मेलन व मुशायरे (03/07/2021)

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एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला द्वारा दिनांक 03/07/2021 को शाम 6 बजे "कवियों का दिल अदब की महफ़िल" ऑनलाइन वेबिनार 【01】(खुशियों के पल) अखिल भारतीय कविसम्मेलन व मुशायरे का आयोजन  किया गया। जिसमें विभिन्न राज्यों व प्रान्तों से उपस्थित सभी प्रख्यात कलमकारों को Movement Of Happiness Award 2021 से नवाज़ा गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री गणेश दत्त जी (पंचकूला) द्वारा की गई। डॉ० प्रतिभा 'माही' जी ने कार्यक्रम का संचालन किया।  डॉ० प्रतिभा 'माही' जी ने प्रेम-श्रृंगार से ओतप्रोत ग़ज़ल सुनाई........ दिया एक जलाया सवेरे-सवेरे कोई पास आया सवेरे-सवेरे  सजा सेज कलियाँ लगीं गुदगुदाने हिया से लगाया सवेरे-सवेरे बतायें क्या तुमको कयामत क्या आयी लबों पर सजाया सवेरे-सवेरे नजर से नजर जब मिलाई थी उसने  नशा सा पिलाया सवेरे-सवेरे चुराकर जिया जब वो जाने लगा था  घटा बनके छाया सवेरे-सवेरे  मैं मदहोश होकर लगी झूमने जब आ खुद में समाया सवेरे-सवेरे न जाने क्यूँ माही चढ़ी ये ख़ुमारी  कदम डगमगाया सवेरे-सवेरे •••••••••••••••••••••• ©® डॉ प्रतिभा 'माही' •...