प्रेम सु नाऊं , हास्य सु नाऊं , वीरों की ललकार सुनाऊँ ..! दिल में प लता प्यार सु नाऊं , या सजता श्रृंगार सुनाऊँ ...!! कुदरत का हर रंग है यारो , हर र स की मधुशाला है..! भारत माँ के वाशिंदों की, यार कहो चीत्कार सुनाऊँ ...!! जो तुम कहदो वही सुनाऊँ ...!!! जो तुम कहदो वही सुनाऊँ ...!!! रूह से रूह का मिलन करा कर ...! रूहानी मंज़र दिखलाऊँ ...! जो तुम कहदो वही सुनाऊँ ...!! गीत-ग़ज़ल मुक्तक सब कु छ है...! कौन - कौन से रँग दिखलाऊँ ..! जो तुम कहदो वही सुनाऊँ ....!! मेरी र ब की पक्की यारी ..! मिलना हो तो मैं मिलवा ऊँ ...! जो तुम कहदो वही सुनाऊँ ...!! मैं गीत हूँ संगीत हूँ हर द...
बीत गया जो वक्त कभी वो , लौट न वापस आएगा ...! माटी का पुतला है तू , माटी में मिल जाएगा .....! माटी में मिल जाएगा .....! आजा मिलकर जतन करें और लोगों का उपकार करें ...! प्यार बाँट कर इस दुनिया को , प्यार भरा भंडार भरें ...! प्यार भरा भंडार भरे ...!2 जो कुछ बाँटा इस धरती पर , जन्नत में तू पाएगा ...! माटी का पुतला है तू , माटी में मिल जाएगा ....! माटी में मिल जाएगा ....! बीत गया जो वक्त कभी वो , लौट न वापस आएगा ...! आओ प्यारे पास हमारे , सच्ची बात बताते हैं ...! निर्धन निर्बल भूखे प्यासे , सबको कण्ठ लगाते हैं ...! सबको कण्ठ लगाते हैं ...! हुनर सिखाते हैं जीने का , किस्सा जन - जन गाएगा ...! माटी का पुतला है तू , माटी में मिल जाएगा ....! माटी में मिल जाएगा ....! बीत गया जो वक्त कभी वो , लौट न वापस आएगा ...! अपने कर्मों की खेती से, दिल मे ं जगह बनाले तू..! सुन ले यारा ...
मैं हिंद राष्ट्र पर लिखती हूँ, उसके ही गीत सुनाती हूँ । हिन्दू है आधार जगत का, सबको यह बतलाती हूँ मैं गीत हिन्द के गाती हूं....!2 कर्मों से हैं हिंदुस्तानी , और व्यवहार स्वदेशी है। रहन - सहन और खान - पान सब , घर संसार स्वदेशी है । कसम उठाई मान रखेंगे , हम अपने संस्कारों का। मातृभूमि की खातिर अपना, जीवन सार स्वदेशी है।। हम सबका प्यार सनातन है। जग का आधार सनातन है।। उस मातृभूमि को नमन मेरा...! जहाँ कण-कण यार सनातन है...!! द्रोणाचार्य की धरती से , शीश नवाने आई हूँ । हर घर में इक बीज शौर्य का, आज उगाने आई हूँ।। चाहो तो ले लो तुम आकार, घर में पौध लगालो तुम। दुर्गा बनकर दैत्यों का मैं , नाश कराने आई हूँ।। पाँच कुला की धरती से मैं, मंच सजाने आई हूँ । गीत ग़ज़ल मुक्तक सब लेकर, आज सुनाने आई हूँ।। खुशियों से आ, भर लो झोली,प्रीत का दीप जलालो तुम। चुन चुन कर उल्फ़त के मोती, आज लुटाने आई हूँ। अर्जुन बनकर युद्ध में ल...
बहुत सुंदर लेखन।
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